आज की संत सरिता के नोट्स
राम बिन तन की ताप न जाये।
तन माने स्थूल ताप।
जिसको आप तन कहते हैं वो मन है।
जिसको आप चेतना कहते हैं वो प्रकृति मात्र है।
मन माने विचार, भावना, अच्छा लगना बुरा लगना और यह सब भौतिक है।
सारा ताप तन का है। तन ही मन है।
मन और कुछ नहीं है।
अहम प्रकृति की संतान है ~श्रीमद्भागवत गीता ।
मन तन की संतान है।
अहम अगर प्रकृति से आता है तो मन तन से आता है। यही तो रिश्ता है।
तन अन्न से आता है, तन से आया मन, मन से आया ब्रह्म।
"अन्नम् ब्रह्म।"
हम अंदरूनी को मानते है सम्मानीय।
जिसको आप अंदरूनी कह रहे हो वो सिर्फ बहारी है।
हमारे विचारो और भावनाओं को हम ज्यादा भाव दे देते हैं और वो हैं कुछ नहीं अन्न है, पदार्थ हैं।
जैसा खाओ अन्न वैसा होगा मन। - बुजुर्ग
अन्न ही मन बना जाता है।
मन और भावना को कितनी इज्जत देनी है? जितनी आलू और प्याज को देते हैं।
उदा. सोने के बाद कैसा महसूस होता है। क्योंकि। मन विचार और भावना से खाली होते हैं।
दूर से देखा तो दो गंजे उछल रहे थे, पास जाकर देखा तो आलू उबल रहे थे।
अगली बार जब भी भावना या क्रोध परेशान करे तो कहना आलू उबल रहे हैं, अंडे उछल रहे हैं।
आंतरिक तो बस राम है। राम माने आत्मा।
भीतर जो कुछ भी उछल रहा है वो बस खाया पिया है। और खाया पिया मुंह से नहीं जाता वो सभी इंद्रियों से अंदर जाता है।
क्योंकि इंद्रियाँ जो कुछ भी खाती-पीती हैं वो बन जाता है, मन।
योग शब्द आता है प्रत्याहार।
झूठ भी अपना नाम रख ले सच तो कुछ दूर तक तो वो चल ही लेता है।
न जाने कितने झूठ हैं जो अब भी चले जा रहे हैं। ये सच का प्रताप है।
जो बाहरी है जैसे ही वो अपना नाम रख देता है अंदर का, वैसे ही उसे ताकत मिल जाती है।
अहम अपनेआप को मैं (आत्मा) बताकर चल जाता है।
तू मेरा नहीं तू पराया है।
जब तक पराये को अपना कहोगे तब तक अत्मबोध कैसे होगा?
ये तन की ताप है बस जैसे कोई रसायनिक क्रिया हो।
होसियार जीव तन के ताप को मन का ताप नहीं बनने देता।
जो बहारी है उसे मैं बाहरी ही जानूगा, उसको अपना नहीं बना लूंगा।
सारी बात तन की है अंदर की बात तो राम की होती है।
लड़की की पसंद कुछ अलग है और लड़के की पसंद अलग है क्योंकि उनका तन अलग है।
तन के बदलते ही मन बदल जाता है।
बच्चा पहले दादा दादी को छोड़ता है, फिर मां-बाप को छोड़ता है, फिर दोस्तों को छोडता है। क्योंकि तन बदल रहा है।
तन ऐसा जैसे बिकर के भीतर कई तरह के रसायन रखे हुए हैं।
शरीर आपको चला रहा है।
आपको बहुत बड़ा धोका है अगर आप शरीर को और मन, विचार को अपना कहते हैं।
शरीर ने कुछ नहीं करा आपसे पूछकर? तो विदाई भी आपसे पूछकर लेगा क्या?
शरीर न आया आपसे पूछके, न बदला आपसे पूछके विदा भी आपसे पूछ के नहीं लेगा।
तू मेरा है नहीं मैं तेरी आज्ञा का क्यों पालन करूँ।
दो 'मैं' होते हैं एक जो तन से उठता है दूसरे का नाम राम है।
तन के खेल चलते रहे बड़े अच्छे हैं हम उनसे लिपटेगें नहीं।
मेरा क्या? बड़ी शर्म उठ रही है, मेरा क्या?
प्रकृति अलग है तुम अलग हो। प्रकृति परायी है।
निर्लिप्त के लिए जगत क्रीड़ा क्षेत्र है।
हमारे लिए तो प्रकृति पराई है।
प्रकृति से जो भी आ रहा है उसको मैं मत बोलो।
आप तोड़-फोड़ भी केवल उसी को कर सकते हो जो आपकी है, प्रकृति का ख्याल रखो।
ये याद रखो कि ये तुम नहीं हो ये तुम्हारा नहीं है, लिप्त मत हो जाना।
जितने भी ताप हैं वो आलू, गोभी, प्याज, टिंडे हैं।
क्रोध आये बोलिये, आ गया करेला।
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"जल में अगन अधिकाई"
पंच भूतो का प्रतिनिधि है जल। जल में आग लग गई ये हमारे ऊपर तंज है।
हम ऐसे कलाकर हैं जो जहाँ हो नहीं सकता वहाँ हम सका देते हैं।
कही भी लगी हुई आग मेरे मन का ताप नहीं बन सकती।
मन और तन बहुत एक होकर चलते हैं।
मनुष्य पूरा ही साइकोसोमेटिक होता है।
तन के पीछे मन चले ये तो होगा ही होगा।
मन के पीछे तन को चलने में जान लगती है।
राम के पीछे मन, मन के पीछे तन ये मुक्त पुरुष है।
अगर जल में आग का लगना झूठ है तो तुम जिसको मैं बोल रहे हो वो झूठ है।
तन में लगी होगी आग मेरा क्या? मेरा सरोकार तो राम से है।
कोई भाव उठा आपने उसको बोल दिया, "मेरा क्या?" वो ठंड़ी पड़ जायेगी।
आपने उसको जैसे ही मेरा बोला वो भबक के उठेगी।
बाहर से जगे हुए हैं वो भीतर से सोये हुए। ये अध्यात्मिक आदमी है।
बाहर से सब कर्म करते हैं और भीतर अराम करते हैं।
जीव जीवनभर भागता है और पाता नहीं; अध्यात्म कहता है, 'इसी क्षण पा सकते हो।'
भीतर से शांत हो जाओ फिर देखो कि तुम्हारा शोर संगीत बनाता है कि नहीं।
अपनेआप को उससे अलग रखो।
हम पचास हजार साल पहले भी परेशान थे हम आज भी परेशान हैं।
ये ताप मन का नहीं तन का है।
पूरानी सारी लड़ाइयाँ किन मुद्दों पर हुईं हैं? जमीन, अहंकार......।
आज कुछ बदला है क्या?
जो महाभारत के मुददे थे वो मुद्दे आज भी हैं।
भ्रम में हम आज भी हैं, भ्रम में हम तब भी थे।
अपने स्वार्थ के लिए किसी की जान भी ले सकता हूँ — ले बली है।
Ex. चालीस नर बलि का प्रमाण।
अहम आता है प्रकृति के एक किसी छोटे से किस्से को खण्ड को मन का नाम देने से।
मछली का संबंध पूरे सागर से नहीं होता। मछली का संबंध एक कोशिका से होता है।
वो ये नहीं कहती मैं सागर हूँ, वो कहती है मैं सागर की मछली हूँ।
मछली कहती है मेरे बाहर है सागर है उसके अंदर क्या है फिर।
मछली के पास कुछ भी है जो सागर के बाहर का कुछ भी है?
इसे अंहकार कह रहे हैं।
मछली हम हैं सागर प्रकृति है।
अहंकार पैदा होता है समुचे को छोड़कर, अंश को पकड़कर।
पूरे को छोड़ा थोड़े को पकड़ा।
और नतीजा जल में रही, जल में प्यासी।
आप जिसमें होते हो वो ही आपकी अतृप्ती का कारण बन जाती है।
हमारी यही तो पीड़ा है प्रकृति नहीं है। हमारे पास सागर में प्यासे हैं।
कारण क्योंकि अंहकार सागर से स्वयं को भिन्न मानता है।
यदि अहंकार स्वयं को प्रकृति ही मान ले तो उसे और कुछ पाने की छटपटाहट खत्म हो जाती है।
प्रकृति में और अंहकार में एक ही चीज है। अंहकार में जोड़कर कोई वृद्धि नहीं हो जाती है।
जब तक अपनेआप को अपूर्ण मान रहे हो तब तक अंहकार है।
जैसे ही अंहकार मिटता है प्रकृति और आप एक हो जाते हो।
फिर कह देते हैं कि यह जो समूची प्रकृति है यही परमात्मा है या मेरी है।
जब भीतर परम तत्व होता है तब आप प्रकृति को देखते हो और उसके दृष्टा होते हो।
जब परमतत्व नहीं होता तो आप प्रकृति के प्रति कामना रखेगो या उपेक्षा करोगे।
जब भीतर राम नहीं रहते तो संबंध कामना का ही बनता है।
जो प्रकृति का दृष्टा हो गया वो सबके लिए करुण हो जाता है।
अगर बाहर करुणा आ रही है तो भीतर राम भी आ रहे हैं।
प्रकृति के प्रति मैत्री रखने के लिए हृदय में राम होना आवाश्यक है।
भावना राम नहीं होती।
आप जिससे अलग हो ही नहीं उसी के बीच में रहोगे और उसके लिए ही तड़पोगे।
अंहकार आपनी छाया में स्वयं को ढूंढ रहा है।
विशुद्ध अद्वैत तो जगत की सत्ता को मानता ही नहीं।
मुक्ति मतबल- मुक्त तो होना लेकिन तुम्हें तुम से ही मुक्त होना है। तुम हो इससे ही मुक्त होना है।
अद्वैत वेदांत सबसे ऊँची चीज है और पूरी दुनिया ने माना है।
चलाकी इतनी है- जगत तुम्हारा सपना है। जगत तुम्हारे द्वारा चित्र मात्र है, तुम चित्रकार हो। तुम कहानीकार हो जगत तुम्हारी कहानी है।
तुम अपने चित्र से ही डरते हो।
हीरे-मोतियों का अपना क्या मूल्य है? तुम ही तो मूल्य लगते हो। और तुम ही रोेते हो।
तुम वो हो जैसे मकड़ी जाल को रचती है आपने ही भीतर से। और फिर तुम ही उसमें फंस जाते हो।
हमने दुनिया को रची थी नहीं, हम दुनिया लगातार रच रहे हैं। बेहोशी में ये बात समझ में आती नहीं।
ये पूरी दुनिया तेरे ही पेट से निकली है मकड़ी!
दुनिया की ओर देखने की जगह अपने पेट की ओर देख मकड़ी।
जो कारणता को समझ जाता है वो कामना से मुक्त हो जाता है।
कहता है मैं ही कारण हूँ मैं क्या कामना करूँ।
घड़ा बोले, मैं मुझे मुट्टी चाहिए। अरे तू ही मिट्टी है और कुम्हार भी तू ही है।
माटी कुदम करेंदी यार वहावाह माटी दी गुलजार।
यह बात लम्बे अभ्यास से साधना जानना पड़ती है। शब्दों से इशारा होता है।
पानी में मीन प्यासी सुन सुन मोहे आवे हाँसी।
ये वेदांत के सुत्र हैं, संतो ने इन्हें जनमास के लिए रचे हैं। इन्हें जीने पड़ते हैं!
मन का सुन्न पड़ जाना और मौन हो जाने में अंतर होता है।
तुम्ह पिंजरा मैं सुवना तोरा।
दरसन देहु भाग बड़ मोरा।
राम पिंजड़ा है तुम उसके भीतर हो। लेकिन पता नहीं।
दर्शन- इन्द्रीयतीत ज्ञान।
कुछ ऐसा जान लेना जो इंन्द्रीयों से नहीं जाना जा सकता उसे दर्शन कहते हैं।
तीन दर्शन होते हैं - फिलोसफी, मंदिर दर्शन, सत्य।
अंहकार तोता है और राम पींजड़ा है।
जानने जाओ तो पुच्छला मत बांध के जाना। शर्ते हटाओ। संस्कार हटाओ।
सत्य हमें इसलिए नहीं मिलता क्योंकि हमने बहुत भारी शर्त रख दी है, वो हैं — मैं।
मैं तो हूँ ही अब तुम बताओ तुम कौन हो। मुझे सत्य को जानना है।
जब तक ये शर्त बची हुई है तब तक सत्य दिखने से रहा।
भारत के दर्शन लक्ष्य है मुक्ति, मुक्ति।
मछली को सागर से अलग मछली का मछलीत्व करता है।
मछली का एक-एक रेसा सागर हैं।
सबसे बड़ी शर्त हमने रखी है — मैं हूँ।
तोते के चारो और पींजड़ा और मनुष्य के चारो और प्रकृति।
दर्शन होगा तो कहाँ होगा?
प्रकृति ही दर्शन है।
मछली को सागर का दर्शन कहा होगा?
मछली को सागर कहाँ प्राप्त होगा?
तो जिन्हें दर्शन होता है उन्हें अपने अंदर होता है, सम्मुख होता है, लगातार होता है।
जित देखूँ उत तू ही तू। तू तू करता तू हुआ।
चीज अगर अच्छी है तो अभी चाहिए और पूरी चाहिए और निरंतर चाहिए।
अपून को अभीछ मांगता!
जो लीन हो गया वो समय के मध्य बैठा हुआ है।
समय घूम रहा है मुझे तो पता भी नहीं चला।
सुख आया जिसको आया उसने भोग लिया, मुझे तो पता भी नहीं चला।
जिसको दुख था वो रोया, मुझे तो पता भी नहीं चला।
जब तक तोता, तोता ही रहेगा अपनी नजर में, तब तक सागर भी उसके लिए पिजंडा है।
पंख पड़फडायेगा कुछ नहीं पायेगा।
साहब कह रहे हैं, "तुम कुछ नहीं हो तुम तुम्हारे पूरखे हो।"
तुम्हें क्यों लगता तुम हो?
तन होता है पर मन नहीं होता।
जैसे पत्ते, पत्थर, पानी का बाहव है आप नहीं हैं।
तुम नहीं हो।
आप कुछ नहीं हो बहते पानी की धारा भर है उसने भी आपका नाम पकड लिया है। थोडी देर बाद किसी ओर का नाम पकड़ लेगी।
कहीं की ईट कहीं का रोडा भनुमति ने कुनबा जोड़ा।
फिर बोलते हैं मैं..............।
हम रज से ही तो उत्पन्न हुए हैं। रज माने धूल, गंदगी वो रज बोल रही है — मैं............।
तुम नहीं हो।
मरते है मरने की आरजू में मौत आती है पर नहीं आती। ~ मिर्ज़ा ग़ालिब
वो अपना मिटना भी अपने होते हुए देखना चाहता है।
प्रेम की पूण्यता का नाम ही मृत्यु होता है।
योग माने मिट जाना।
मिलन तो चाहिए पर मिलन को देखने के लिए हम बचे रहे, ये शर्त है। ये ही शर्त न प्रेम को मिलने देती, न राम को।
अपना हिसाब ही तो दुख है।
दुख ही दुखी है।
दुखी ही दुख है।
दुख मैं को होता और मैं ही नकली है तो दुख कहा से असली हो गया।
दुख काल्पनिक है।
राम भी चाहिए पर कैसा? जैसा हम बनाए वैसा।
हम तो राम को भी राम नहीं रहने देते। राम को भी मेरा राम बना लेते और फिर जोर से बोलते हैं — जय श्रीराम।
जैसे आप हैं वैसे ही आपने कुछ गढ़ लिया है। आपके राम राम है ही नहीं।
मुक्ति भी चाहिए लेकिन मेरी वाली- ले लो!
जब तुझ बिन नहीं कोई मौजूद तो ये हंगामा क्या है। या इलाही ये माजरा क्या है।
जो अपनी ही नजरो में अस्तित्वमान है वो अंहकार है।

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